उत्तराखंड का अनोखा मंदिर, साल में सिर्फ एक दिन पूजा और पाताल लोक से जुड़ी पौराणिक कथा..
उत्तराखंड: उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ियों में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनसे सदियों पुरानी परंपराएं और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक है चमोली जिले की उर्गम घाटी में स्थित वंशी नारायण मंदिर। समुद्र तल से करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए देशभर में खास पहचान रखता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके कपाट पूरे साल बंद रहते हैं और रक्षाबंधन के अवसर पर केवल एक दिन के लिए खोले जाते हैं। इस खास दिन मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही होती है और स्थानीय महिलाएं भगवान विष्णु को भाई मानकर उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं।
सालभर बंद रहते हैं मंदिर के कपाट
उर्गम घाटी के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित वंशी नारायण मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं है। ऊंचाई और कठिन पहाड़ी रास्ते के कारण यहां सामान्य दिनों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बेहद सीमित रहती है। मान्यता है कि रक्षाबंधन के दिन ही मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। कपाट खुलने के साथ ही आसपास के गांवों से श्रद्धालु मंदिर की ओर पहुंचने लगते हैं। खास तौर पर महिलाएं इस दिन भगवान विष्णु को राखी अर्पित करने के लिए मंदिर तक जाती हैं। शाम को पूजा संपन्न होने के बाद मंदिर के कपाट फिर बंद कर दिए जाते हैं।
भगवान विष्णु को भाई मानकर बांधी जाती है राखी
रक्षाबंधन के दिन यहां निभाई जाने वाली परंपरा इस मंदिर को दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है। स्थानीय महिलाएं भगवान विष्णु को अपना भाई और रक्षक मानते हुए उनकी कलाई पर राखी बांधती हैं। इस दौरान महिलाएं अपने परिवार, भाइयों और गांव की सुख-समृद्धि तथा सुरक्षा की कामना करती हैं। दुर्गम पहाड़ी रास्ते और ऊंचाई के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस परंपरा का हिस्सा बनने के लिए मंदिर पहुंचते हैं।
राजा बलि और भगवान विष्णु से जुड़ी है मान्यता
वंशी नारायण मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा का संबंध भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि से बताया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। इसके बाद भगवान ने अपने विराट स्वरूप से तीनों लोक नाप लिए और राजा बलि को पाताल लोक भेज दिया। कहा जाता है कि भगवान विष्णु की भक्ति से प्रसन्न होकर राजा बलि ने उन्हें अपने साथ रहने का आग्रह किया। भगवान विष्णु ने यह स्वीकार कर लिया और पाताल लोक में रहने लगे। इसके बाद माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वहां से वापस लाने के लिए राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई बनाया। बदले में राजा बलि ने भगवान विष्णु को मुक्त करने का वचन दिया। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में कहा जाता है कि इसी कथा की स्मृति में रक्षाबंधन के दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। उर्गम घाटी की महिलाएं भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भगवान नारायण को राखी बांधती हैं। हालांकि मंदिर से जुड़ी ये बातें पौराणिक और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं, लेकिन सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। रक्षाबंधन का पर्व समाप्त होते ही मंदिर के कपाट फिर बंद कर दिए जाते हैं। इसके बाद अगले रक्षाबंधन तक यह ऊंचा धाम एक बार फिर शांत हो जाता है। यही अनोखी परंपरा वंशी नारायण मंदिर को उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों में विशेष पहचान दिलाती है।





