उत्तराखंड में महंगी हो सकती है बिजली, यूपीसीएल की 5900 करोड़ की मांग पर आयोग ने मांगे सुझाव..

उत्तराखंड में महंगी हो सकती है बिजली, यूपीसीएल की 5900 करोड़ की मांग पर आयोग ने मांगे सुझाव..

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में बिजली उपभोक्ताओं को आने वाले समय में बड़ा झटका लग सकता है। राज्य की बिजली वितरण कंपनी उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) ने उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग के समक्ष एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की है, जिसमें करीब 5,900 करोड़ रुपये के वित्तीय दावे को मान्यता देने की मांग की गई है। यदि आयोग इस दावे को स्वीकार कर लेता है, तो बिजली दरों में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। यूपीसीएल की ओर से दायर याचिका पर नियामक आयोग ने सार्वजनिक प्रक्रिया शुरू करते हुए सभी हितधारकों, उपभोक्ता संगठनों और संबंधित पक्षों से 27 जुलाई तक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं। इसके बाद आयोग इस मामले की सुनवाई करेगा और सभी पक्षों को सुनने के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

यह पूरा विवाद उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद बिजली विभाग की परिसंपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग राज्य बनने के बाद दोनों राज्यों के बीच बिजली विभाग की संपत्तियों के हस्तांतरण के लिए एक ट्रांसफर स्कीम लागू की गई थी। यूपीसीएल का कहना है कि 12 अक्टूबर 2003 को उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) और यूपीसीएल के बीच हुए समझौते के तहत 1,058.18 करोड़ रुपये मूल्य की सकल अचल संपत्तियां (Gross Fixed Assets) उत्तराखंड को हस्तांतरित की गई थीं। हालांकि, निगम का आरोप है कि विद्युत नियामक आयोग ने अब तक टैरिफ निर्धारण के दौरान केवल 508 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों को ही आधार माना। कंपनी के अनुसार इससे पिछले दो दशकों में उसे मूल्यह्रास (Depreciation), इक्विटी पर रिटर्न और ब्याज जैसी वित्तीय मदों में भारी नुकसान उठाना पड़ा।

24 वर्षों के वित्तीय नुकसान का दावा

यूपीसीएल का कहना है कि परिसंपत्तियों के कम मूल्यांकन के कारण उसे पिछले लगभग 24 वर्षों में मिलने वाले वित्तीय लाभ नहीं मिल सके। इसी आधार पर निगम ने आयोग से 936.37 करोड़ रुपये के मूल दावे (ARR) के साथ 4,963.65 करोड़ रुपये की कैरिंग कॉस्ट जोड़कर कुल 5,900.01 करोड़ रुपये का दावा प्रस्तुत किया है। कंपनी का तर्क है कि यदि इस राशि को मान्यता मिलती है तो उसकी वित्तीय स्थिति मजबूत होगी और लंबे समय से लंबित वित्तीय असंतुलन दूर किया जा सकेगा। यूपीसीएल के अनुसार इस मामले पर कंपनी के निदेशक मंडल की 126वीं बोर्ड बैठक में विस्तार से विचार किया गया था। इसके बाद उत्तराखंड शासन के ऊर्जा विभाग ने विद्युत अधिनियम-2003 की धारा 108 के तहत नियामक आयोग को इस विषय पर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए। सरकार ने आयोग से कहा कि जनहित और बिजली निगम की वित्तीय स्थिति दोनों को ध्यान में रखते हुए मामले की जांच की जाए। शासन के निर्देशों के बाद ही यूपीसीएल ने आयोग के समक्ष औपचारिक याचिका दाखिल की।

बिजली दरों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की आशंका

यूपीसीएल ने अपनी याचिका में यह भी स्वीकार किया है कि यदि आयोग उसके दावे को पूरी तरह स्वीकार कर लेता है और पूरी राशि को बिजली टैरिफ में समायोजित किया जाता है, तो इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में राज्य में बिजली दरों में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, अंतिम निर्णय उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग द्वारा सभी पक्षों की आपत्तियां, सुझाव और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही लिया जाएगा। आयोग चाहे तो दावे को पूरी तरह, आंशिक रूप से या पूरी तरह अस्वीकार भी कर सकता है।

उपभोक्ताओं की नजर आयोग के फैसले पर..

अब प्रदेश के घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक बिजली उपभोक्ताओं की निगाहें आयोग की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। यदि बिजली दरों में बड़ी वृद्धि होती है तो इसका असर आम लोगों के घरेलू बजट के साथ-साथ उद्योगों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और सेवा क्षेत्र की लागत पर भी पड़ सकता है। फिलहाल आयोग ने सभी संबंधित पक्षों से निर्धारित समय सीमा के भीतर अपने सुझाव और आपत्तियां प्रस्तुत करने को कहा है। इसके बाद सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने पर आयोग अंतिम आदेश जारी करेगा, जिससे यह तय होगा कि बिजली उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा या नहीं।

 

 

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