बीमा दावा टालने पर उपभोक्ता आयोग सख्त, कंपनी को 2 लाख 7 हजार रुपये भुगतान का आदेश..

बीमा दावा टालने पर उपभोक्ता आयोग सख्त, कंपनी को 2 लाख 7 हजार रुपये भुगतान का आदेश..

 

 

उत्तराखंड: बीमा दावे के भुगतान में अनावश्यक देरी और तकनीकी आपत्तियों का सहारा लेकर लाभार्थी को राहत देने से इनकार करना एक बीमा कंपनी को भारी पड़ गया। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने काशीपुर की एक महिला की शिकायत पर सुनवाई करते हुए बीमा कंपनी को न केवल बीमा राशि का भुगतान करने के निर्देश दिए हैं, बल्कि मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में अतिरिक्त धनराशि भी अदा करने का आदेश दिया है। यह मामला काशीपुर क्षेत्र के ग्राम बरखेड़ा पांडे निवासी बतूल बेगम से जुड़ा है, जिन्होंने अपने दिवंगत पति के बीमा दावे के भुगतान के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। आयोग ने मामले में सुनवाई के बाद माना कि बीमा कंपनी की ओर से दावा निस्तारण में बरती गई लापरवाही और अनावश्यक विलंब उपभोक्ता सेवा में कमी की श्रेणी में आता है। जानकारी के अनुसार बतूल बेगम के पति मोहम्मद शरीफ का यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में बचत खाता था। वह प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना से जुड़े हुए थे और उनके खाते से नियमित रूप से प्रीमियम की राशि कटती रही। वर्ष 2023 में एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। दुर्घटना के बाद परिवार को मिलने वाली बीमा सहायता के लिए बतूल बेगम ने आवश्यक दस्तावेजों के साथ दावा प्रस्तुत किया था।

शिकायतकर्ता का कहना था कि सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने और दस्तावेज जमा करने के बावजूद उनका बीमा दावा लंबे समय तक लंबित रखा गया। कई बार संपर्क करने के बावजूद जब कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने न्याय के लिए जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की ओर से आयोग को बताया गया कि बैंक ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए समय पर प्रीमियम राशि संबंधित बीमा कंपनी को भेज दी थी। साथ ही दावा प्रपत्र और अन्य जरूरी दस्तावेज भी बीमा कंपनी को ई-मेल के माध्यम से उपलब्ध करा दिए गए थे।

वहीं बीमा कंपनी ने अपने पक्ष में तर्क देते हुए कहा कि दावा समय पर प्राप्त नहीं हुआ था तथा दस्तावेजों में कुछ तकनीकी कमियां थीं, जिसके कारण भुगतान नहीं किया जा सका। हालांकि आयोग ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि केवल तकनीकी आधारों पर किसी वैध और वास्तविक बीमा दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष राजीव कुमार खरे और सदस्या डॉ. मनीला की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करना है। बीमा कंपनियों को दावों के निस्तारण में संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। आयोग ने अपने आदेश में विभिन्न राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय उपभोक्ता आयोगों के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया, जिनमें उपभोक्ता हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए जाने की बात कही गई है।

आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता को दो लाख रुपये की बीमा राशि का भुगतान करे। इसके अतिरिक्त मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए पांच हजार रुपये तथा वाद व्यय के रूप में दो हजार रुपये भी अदा किए जाएं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश जारी होने के 45 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किए जाने की स्थिति में परिवाद दाखिल होने की तिथि से छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। उपभोक्ता अधिकारों के क्षेत्र में इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि बीमा कंपनियां केवल तकनीकी कारणों का हवाला देकर वास्तविक और पात्र दावों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकतीं। साथ ही यह फैसला उन उपभोक्ताओं के लिए भी एक मिसाल है, जो अपने अधिकारों के लिए न्यायिक मंचों का सहारा लेने से हिचकते हैं।

 

 

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