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हिमनद झीलों की निगरानी को हाईटेक सुरक्षा कवच..

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हिमनद झीलों की निगरानी को हाईटेक सुरक्षा कवच..

वसुंधरा ताल में स्थापित हुआ अर्ली वार्निंग सिस्टम..

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को समय रहते पहचानने के लिए तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। इसी कड़ी में चमोली जिले के वसुंधरा ताल में आधुनिक निगरानी प्रणाली स्थापित की गई है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की की ओर से तैयार यह सिस्टम झील के जलस्तर, मौसम और बर्फ में होने वाले बदलावों का आकलन करने में मदद करेगा। करीब 61 लाख रुपये की लागत से विकसित इस प्रणाली से आंकड़े मिलने शुरू हो गए हैं। फिलहाल इसका परीक्षण किया जा रहा है। परीक्षण के परिणाम संतोषजनक रहने पर राज्य की अन्य हिमनद झीलों में भी ऐसी व्यवस्था स्थापित करने पर विचार किया जाएगा। वसुंधरा ताल प्रदेश की पहली हिमनद झील है, जहां यह तकनीक लगाई गई है।

सैटेलाइट तकनीक से जुड़ेगा दुर्गम क्षेत्र
वसुंधरा ताल तक पहुंचना और वहां नियमित निगरानी करना चुनौतीपूर्ण है। ऊंचाई पर स्थित होने के कारण इस क्षेत्र में सामान्य मोबाइल नेटवर्क की सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सिस्टम को संचालित करने के लिए इरिडियम सैटेलाइट संचार तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इससे सेंसरों से प्राप्त जानकारी संबंधित विभागों तक पहुंचाई जा सकेगी। बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए सौर पैनल लगाए गए हैं। इसके साथ 280 एम्पीयर क्षमता की बैटरी उपलब्ध कराई गई है, जिससे करीब 10 दिन तक बैकअप मिल सकता है।

झील के जलस्तर और बर्फ में बदलाव की होगी निगरानी
इस सिस्टम में मौसम से जुड़े कई सेंसर लगाए गए हैं, जो हवा की गति और दिशा, बारिश, तापमान, वायुदाब तथा सौर विकिरण का रिकॉर्ड तैयार करेंगे। वाटर लेवल सेंसर झील में पानी के स्तर पर नजर रखेगा, जबकि एक्सेलेरोमीटर और टिल्ट सेंसर हिमस्खलन तथा जमीन की हलचल से संबंधित गतिविधियों को दर्ज करने में मदद करेंगे। इसके साथ ही बर्फ की गहराई मापने के लिए स्नो डेप्थ सेंसर लगाया गया है। झील के अलग-अलग स्तरों पर पानी के तापमान के लिए सात और सतह के तापमान के लिए एक अतिरिक्त सेंसर लगाया गया है। वसुंधरा ताल की लंबाई लगभग 900 मीटर, चौड़ाई 600 मीटर और गहराई करीब 38.50 मीटर बताई गई है।

हर दो घंटे में विभागों तक पहुंचेगी रिपोर्ट
सामान्य परिस्थितियों में सेंसरों से जुटाया गया डेटा हर दो घंटे में सीबीआरआई रुड़की और उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के डैशबोर्ड पर भेजा जाएगा। आपात स्थिति में सिस्टम तत्काल डेटा भेजने में सक्षम होगा। इससे झील या आसपास के क्षेत्र में असामान्य बदलाव सामने आने पर संबंधित एजेंसियों को समय रहते सतर्क होने में मदद मिल सकती है। सीएम पुष्कर सिंह धामी ने इस प्रणाली की स्थापना के पहले चरण को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से प्रदेश की आपदा प्रबंधन क्षमता को मजबूत किया जा रहा है। आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने हिमनद झीलों की निगरानी के लिहाज से इसे अहम पहल बताया। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने भी इसे आपदा से निपटने की तैयारियों को तकनीकी रूप से बेहतर बनाने वाला कदम बताया। सिस्टम स्थापित करने के अभियान में सीबीआरआई के वैज्ञानिकों के साथ एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और आईटीबीपी ने सहयोग किया। अब इसकी परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्ययोजना तय की जाएगी।

 

 

 

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